सोमवार, 30 मई 2011

दादी माँ - कहानी

पर्वतसिंह ने अपनी जवानी के २१ साल भारतीय स्थल सेना की सेवा में बिताए ! उसका गाँव उत्तराखंड के एक पहाडी इलाके में पड़ता था ! जब वह सेना में भरती हुआ था उस वक्त तक उसका गाँव एक पिछड़ा गाँव कहलाता था ! जमीन तो थी लेकिन पानी की कमी थी ! गाँव से करीब आधे किलो मीटर नीचे एक पानी का चस्मा था, वहीं से लोग पानी लाते थे अपने लिए तथा अपने मवेशियों के लिए भी ! गाँव बड़ा नहीं था लेकिन छोटा भी नहीं था ! गाँव के सारे लोग हल लगाकर खेतों में बीज बो देते थे और बाकी ऊपर वाले की मर्जी पर छोड़ देते थे, अगर अच्छी वर्षा हो गयी तो अच्छी फसल हो जाती थी अगर बारीष नहीं हुई और समय पर नहीं हुई तो उस साल गाँव वालों को बड़ी मुशीबतों का सामना करना पड़ता था ! फसलों में गेंहूं, धान, झंगोरा, जौ, मंडुवा, मकई, प्याज लहसून, अरबी, दालें आदि आदि ! वैसे गाँव वालों की मेहनत और अटूट विश्वास के सामने ईश्वर भी समय पर वारीष कर दिया करते थे ! इस गाँव में करीब २५ परिवार थे ! प्राईमरी स्कूल तो नजदीक ही थी लेकिन जूनियर हाई स्कूल गाँव से काफी दूर पड़ता था ! ऐसा नहीं था की इस गाँव के बच्चे प्राईमरी से आगे पढ़ ही नहीं पाते थे ! लगनशील, मेहनती और पक्के इरादे वाले बच्चे दूर के जूनियर हाई स्कूल जाते थे उस दूर के स्कूल में , वहां एक हफ्ते के लिए राशन, रात सोने के लिए हल्का बिस्तर और एक जोड़ी कपडे साथ ले जाते थे ! स्कूल में भी अध्यापकों के लिए पानी और खाना पकाने के लिए लकड़ी भी बच्चों को ही लानी पड़ती थी ! जो बच्चे नजदीकी गाँवों से आते थे वे अपने मास्टर जी के लिए बारी बारी से रोज दूध भी ले आते थे ! पैसे कम थे लेकिन इमानदारी थी, सज्जनता थी और एक दूसरे पर अटूट विश्वास था ! इस गाँव के बच्चे पूरे एक हफ्ते में गाँव आते थे, अपने मैले कपडे स्वयं धोते थे और फिर सोमवार की सुबह दुबारा एक हफ्ते का राशन पानी लेकर दश बजे स्कूल में हाजिरी देने के लिए चले जाते थे ! यह सिलसिला चलता रहता था जब तक बच्चे अपनी ८ वीं की परिक्षा नहीं दे देते थे ! गाँव में करीब सबकी आर्थिक स्थिति एक जैसे ही थी, हाँ उन्नीस बीस का अंतर जरूर था, जिनके बच्चे ज्यादा होते उनको ज्यादा मेहनत करनी पड़ती ! हल बैल सब के होते थे ! दो तीन गाएं कुछ बकरिया और कुछ भेड़ें भी वे पालते थे ! गाँव चारों और से जंगलों से घिरा हुआ था, इस तरह घास लकड़ी की ज्यादा परेशानी नहीं थी ! कस्बा भी गाँव से दूर ही पड़ता था, वहां कसबे में राशन पानी की दुकाने थीं ! एक डाक खाना था ! एक सरकारी छोटा सा नर्सिंग होम था, जहां एक नर्सिंग सहायक तथा एक सफाई कर्म चारी था ! लोग समय का सदपयोग करना जानते थे, चार बज उठकर हल बैल लेकर खेतों में चले जाना, घर की स्त्रियाँ चार बजे ही कूटना पिसने का काम शुरू कर देती थी ! वे फिर गोशाला में जाकर मवेशियों को बाहर निकालती थी, गोबर समेट कर खेतों में डाल कर आती थी, फिर चश्मे से पानी लाती ! जिन घरों में सास ससुर होते थे वहां बच्चों की देखभाल और खाना बनाने की चिता नहीं रहती, लेकिन सभी भाग्यशाली भी तो नहीं होती थी ! बिजली नहीं थी, मिट्टी का तेल इस्तेमाल होता था, हर परिवार को महीने में केवल दो बोतले मिट्टी के तेल की मिलती थी ! उसी से लालटेन या चिमनियाँ जलती थी ! इसी रोशनी में बच्चे पढ़ते थे ! यही नहीं घर की औरतों को हल लगाने वाले के लिए रोटी और बैलों के लिए जौ के आटे का नास्ता लेकर जाना पड़ता था जहाँ हल लगता ! हल के पीछे पीछे भारी डले निकलते उन्हें फोड़ना पड़ता था, फिर घास लकड़ी के लिए जंगल जाना पड़ता, इस तरह पूरा दिन निकल जाता और कहीं जाकर रात के दश बजे खाना खाकर कमर सीधी करने को अवसर मिलता ! ! मर्द हल लगाकर फिर घर के दूसरे कामोंमें लग लगजाते थे , जैसे हल, जुआ, रस्सी बटना, चारपाई की दावन मवेशियों को बांधने के लिए मजबूत रस्सियाँ, बांस की टोकरी, बहुत सारे काम उन्हें करने पड़ते थे ! ईश्वर की उन पर बड़ी मेहर थी की वे बीमार नहीं होते थे ! कभी कभार सर्दी जुकाम, सर दर्द पीड़ा आम बात थी, उसके लिए कुल पुरोहित होते थे ! इन ब्राह्मणों के पास जमीन नहीं होती थी, लेकिन वे संस्कृति और हिन्दी की अच्छी जानकारी रखते थे ! उनकी हर गाँव में अपनी अपनी वृति होती थी, वे शादी विवाह कराते थे, अपने जजमानों के यहाँ मौके बेमौके पूजा करने आते थे ! वही जन्म पत्री बनाते थे, वर वधु का चुनाव वही करते थे और छोटी मोटी दवा भी देते थे ! कुछ पंडित जी तो ज्योतिष के भी अच्छे जानकार थे ! जजमान भी अपनी हैसियत के मुताबिक़ उन्हें दान दक्षिणा देते थे ! कोई लोभी नहीं होता था, सभी गाँव वासी प्रेम से रहते थे, सामाजिक हर काम में सब इकट्ठा होकर एक दूसरे की मदद करते थे !





इस कहानी का मुख्या चरित्र पर्वतसिंह इसी गाँव का रहने वाला था ! इसने भी बचपन में अपने माँ बाप की सारी परेशानियां देखी थी ! इसने भी कठीन रास्तों पर गुजरते हुए ८ वीं की परिक्षा पास की थी ! आगे पढ़ने की गुंजायस भी नहीं थी और उसने भी जोर नहीं डाला अपने माँ बाप के ऊपर आगे पढ़ने के लिए ! दो साल उसने अपने पिता जी के साथ खेती पाती में उनका हाथ बंटाया ! अब वह १८ साल का हो गया था और नौकरी करके अपने पिता जी की आर्थिक मदद करना चाहता था ! वह सेना में भर्ती हो गया ! एक साल की ट्रेनिंग पूरी करने पर उसे जम्मू काश्मीर भेजा गया और उन्हीं दिनों सन १९६५ की लड़ाई छीड़ गयी पाकिस्तान के साथ ! इसकी यूनिट ने इस लड़ाई में बड़ी बहादुरी का काम किया ! जल्दी ही यूनिट को पीस स्टेशन जोशी मठ मिल गया ! इन्ही दिनों उसका विवाह हुआ परमेश्वरी देवी से ! जिस दिन से परमेश्वरी देवी इस घर में बहु बनकर आई उसी दिन से इस घर से दरिद्री धीरे धीरे बाहर जाने लगी और लक्ष्मी और गणेश जी की कृपा दृष्टि होने लगी ! परमेश्वरी देवी एक धर्म परायण नेक सत्यवादी और एक अच्छे संस्कार वाली नारी थी ! पर्वत सिंह भी हवलदार बन गया था ! उनका एक बच्चा भी होगया था नाम रखा सुमेरसिंह ! गाँव के पास तक सड़क आगई थी ! उसके पिता जी ने सड़क के किनारे ही एक छोटी सी परचून की दुकान खोल दी थी ! पर्वतसिंह भी घर पैसा भेजता था और कुछ दुकान से भी आमदनी होने लगी, इस तरह घर में परमेश्वरी देवी ने घर का माहोल ही खुशनुमा बना दिया ! सास ससुर बूढ़े हो गए थे उनकी दवा और खान पान पर विशेष ध्यान रखती थी ! सास के गठिया बाय थी, देर रात तक सास की मालिस किया करती थी ! सास ससुर खुश थे !


बाकी दूसरे भाग में जारी



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