मंगलवार, 31 मई 2011
दादी माँ - दूसरा भाग
लेकिन खेत खलियानों वीरान होने से वे घरों में घुसने लगे ! पहले गाँव फलदार पेड़ों से ढका था, आम, जामुन, संतरे, नीम्बू, चबूतरे, पपीते, सेब, अमरूद और नाशपाती ! समय की आंधी ऐसी चली की फसलों के साथ साथ सारे फलदार वृक्ष को भी उड़ाकर ले गयी ! ऊपर से बाघ का आतंक ! रोज कोई न कोई खबर आती की बाघ नर भक्षी
बन गया है, अमुक गाँव से आदमी को मार गया, अगले गाँव से एक बच्चे को उठाकर ले गया, आदि आदि ! अब माहोल काफी चिंता जनक होगया था ! कुछ परिवार तो बच्चों की सुरक्षा के लिए गाँव छोड़ कर शहरों या कस्बों में जाने लगे ! लेकिन पर्वतसिंह वहीं डटा रहा ! सुमेर ने भी १२ वीं सास कर ली थी और आगे इंजिनियर कोर्स के लिए बंगलौर चला गया था ! धीरे धीरे पर्वत सिंह के माता - पिता जी बीमार रहने लगे और ऊपर वाले की लीला तो देखो दोनों एक हफ्ते के अंतर से एक के बाद दूसरा स्वर्ग वासी हो गए ! अब घर में रह गए पर्वतसिंह और उसकी पत्नी परमेश्वरी ! उधर सुमेरसिंह ने चार साल का कोर्स पूरा किया और अपने साथ पढ़ने वाली एक सेठ की बेटी से शादी कर दी ! वहीं उसकी नौकरी भी लग गयी ! यह सुनकर पर्वतसिंह और उसकी पत्नी को बड़ा सदमा लगा ! और इसी सदमे से आहत होकर वह भी इस पञ्च तत्व के शरीर को छोड़ कर दूसरे लोक को चला गया ! परमेश्वरी पर तो मानों बज्रपात ही होगया ! दो दिन तक तो उसे होश ही नहीं रहा ! गाँव में एकता थी, सारे गाँव वाले इकट्ठे हो गए, कोइ वैद्य को बुलाने गया कोइ दवाई लेने कस्बा गया आखीर उनकी मेहनत रंग लाई और परमेश्वरी देवी होश में आई ! कुछ दिनों तक तो रोना धोना होता रहा, गाँव की बुजुर्ग महिलाएं हर वक्त परमेश्वरी के साथ साथ रहने लगी उसे ढाढस देती रही और जिन्दगी जीने की हिम्मत देती रही ! लडके को खबर दे दी गयी थी लेकिन वह नहीं आया ! समय गुजरता रहा परमेश्वरी रोज अपने लडके का इंतज़ार करती रहती, हर आने वाली बस के आगे खडी हो जाती, लेकिन सुमेर नहीं आया ! इस तरह तीन साल बीत गये ! और एक दिन अचानक सुमेर आया अकेला नहीं अपनी पत्नी सुधा और एक साल के बचे के साथ ! बच्चे के साथ परमेश्वरी अपने को भूल गयी ! सारे गिल्वे शिकवे भूल गयी ! बच्चा भी हर समय दादी के इर्द गिर्द ही घूमता रहता था ! बच्चे का नाम था अमन बहुत सुन्दर और प्यारा था ! दो महीने कब बीत गए पता ही नहीं चला ! इन्हीं दिनों सुमेर ने गाँव की जमीन और मकान दूसरे गाँव के जमीदार को बेच दिया ! परमेश्वरी को खबर भी नहीं होने दी ! फिर आकर अपनी माँ को कहा की "माँ मैंने यह गाँव की पैतृक जमीन बेच दी है, क्या दिया है इसने हमें उलटा दादी दादा और मेरे पिता जी को मेरे से छीन लिया, फिर इसकी देख भाल तू अकेले कर भी नहीं सकती थी, अब तू बंगलौर हमारे साथ ही रहेगी ! देख पोता तेरे साथ किस कदर हिल मिल गया है, अब तुम्हे अपने पोते के साथ ही रहना है !" पहले परमेश्वरी ना नुकुर करती रही लेकिन आखीर जाने के लिए तैयार हो गयी ! गाँव के बुजुर्गों ने जाते जाते उसे सावधान होने को कहा था, सारे गाँव वासी बड़े छोटे उसे भेजने के लिए बस स्टॉप तक आये थे, महिलाएं गले मिल कर खूब रोई थी, बहुत सालों का बंधन जो था ! वे लोग बंगलौर पहुँच गए ! माँ को सुमेर ने कुछ भी नहीं बताया जमीन के बारे में की "उसने जमीन किसको बेची और कितने में बेची " ! सारे पैसे अपने पास ही रख लिए ! बंगलौर आकर दो महीने तक तो माँ का आदर सत्कार होता रहा लेकिन तीसरे महीने में जैसे गर्मी आने लगी सुमेर ने तीन कमरों के मकान होते हुए भी माँ की चारपाई स्टोर रोम में लगा दी ! वहां बेचारी गर्मी से मच्छरों से परेशान होने लगी, लेकिन किसी से कुछ भी नहीं कह पाती थी ! कभी पेट में पीड़ा उठ जाती, कभी बुखार आजाता लेकिन चुपचाप वह सब कुछ सहन करती रहती ! उसे गाँव की याद आती, खुला हुआ घर, न गर्मी न सर्दी, जब कभी सिर में हल्का सा भी दर्द होता गाँव की बहुवें आकर सिर दबाती, पाँव दबाती, कितनी सेवा करती थी वे बहुवें जो अपनी सगी नहीं थी, पर प्रेम की डोर से बंधी थी ! और यहाँ तो सब अपने हैं ! समय निकलता रहा तीन साल बीत गए, पोता अमन अब पांच का हो गया था ! पोता छोटा था लेकिन दादी की परेशानियां समझता था ! एक दिन वह स्कूल से भागता हुआ आया सीधे दादी
के पास स्टोर रोम में गया और जोर जोर से बोला "दादी अब तुम्हे यह घर छोड़ना पड़ेगा, आपके लिए इस घर में कोइ स्थान नहीं हैं ! कल से स्टोर में हमारी नौकरानी रहेगी, ये कम्बल का आधा टुकड़ा ले जाओ और यहाँ से जाओ कहीं भी जाओ पर हमारे घर से जाओ ! परमेश्वरी इस अप्रत्यासित नादिर शाही आदेश से आहत हो गयी ! उसके मुंह के शब्द मुंह में ही रहगये ! वह चुप चाप खडी भौचक्की सी अपने पोते के रौद्र रूप को देख रही थी ! तब तक शोर शराबा सुन कर सुमेर के मम्मी पापा भी वहां आ गए ! उनको देख कर सुमेर और जोर से बोला, "सुनो दादी तुम्हारा सबसे बड़ा अफराध है की आप मेरे इंजिनियर पापा की मम्मी हो और इंजिनियर मम्मी की सास हो ! जब बड़े बड़े लोग आते हैं तो मुझे शर्म आती है आपको दादी कहते हुए ! " उसके पापा ने कहा कहा "तुम ठीक कहते हो, मैं भी यही सोच रहा था ! लेकिन तुमने ये कम्बल दो भागों में क्यों किया, पूरा ही कम्बल दे देते दादी को " ! अमन बोला मम्मी पापा कुछ ही दिनों की तो बात है कल आपको भी बुढापा आ जाना है और मुझे आप लोगों को भी घर से निकालना पडेगा फिर एक और कम्बल फाड़ना पडेगा, ये बचा हुआ टुकड़ा आपके लिए रखा हुआ है ! यह सुनते ही सुमेर और उसकी पत्नी की सोई हुई इंसानियत जाग गयी ! अमन बोला, 'तुमने मेरी दादी को जानवरों से भी गया बीता समझ कर स्टोर रोम में डाल रखा है, मैं भी तो वही शिक्षा ले रहा हूँ आप लोगों से " ! इतना कहते हुए वह दादी से लिपट कर फूट फूर कर रो पड़ा ! उसके मम्मी पापा भी परमेश्वरी के कदमों में गिर पड़े ! गीड गीडाने लगे अपने अफराधों के लिए माँ से क्षमा माँगने लगे ! उस दिन से परमेश्वरी की खूब इज्जत और आदर होने लगा ! उसको एक सजा सजा कमरा दिया गया, वहां कूलर फिट किया गया ! अब दादी पोते एक ही कमरे में रहते हैं ! दादी भी खुश और पोता भी खुश हैं !
सोमवार, 30 मई 2011
दादी माँ - कहानी
पर्वतसिंह ने अपनी जवानी के २१ साल भारतीय स्थल सेना की सेवा में बिताए ! उसका गाँव उत्तराखंड के एक पहाडी इलाके में पड़ता था ! जब वह सेना में भरती हुआ था उस वक्त तक उसका गाँव एक पिछड़ा गाँव कहलाता था ! जमीन तो थी लेकिन पानी की कमी थी ! गाँव से करीब आधे किलो मीटर नीचे एक पानी का चस्मा था, वहीं से लोग पानी लाते थे अपने लिए तथा अपने मवेशियों के लिए भी ! गाँव बड़ा नहीं था लेकिन छोटा भी नहीं था ! गाँव के सारे लोग हल लगाकर खेतों में बीज बो देते थे और बाकी ऊपर वाले की मर्जी पर छोड़ देते थे, अगर अच्छी वर्षा हो गयी तो अच्छी फसल हो जाती थी अगर बारीष नहीं हुई और समय पर नहीं हुई तो उस साल गाँव वालों को बड़ी मुशीबतों का सामना करना पड़ता था ! फसलों में गेंहूं, धान, झंगोरा, जौ, मंडुवा, मकई, प्याज लहसून, अरबी, दालें आदि आदि ! वैसे गाँव वालों की मेहनत और अटूट विश्वास के सामने ईश्वर भी समय पर वारीष कर दिया करते थे ! इस गाँव में करीब २५ परिवार थे ! प्राईमरी स्कूल तो नजदीक ही थी लेकिन जूनियर हाई स्कूल गाँव से काफी दूर पड़ता था ! ऐसा नहीं था की इस गाँव के बच्चे प्राईमरी से आगे पढ़ ही नहीं पाते थे ! लगनशील, मेहनती और पक्के इरादे वाले बच्चे दूर के जूनियर हाई स्कूल जाते थे उस दूर के स्कूल में , वहां एक हफ्ते के लिए राशन, रात सोने के लिए हल्का बिस्तर और एक जोड़ी कपडे साथ ले जाते थे ! स्कूल में भी अध्यापकों के लिए पानी और खाना पकाने के लिए लकड़ी भी बच्चों को ही लानी पड़ती थी ! जो बच्चे नजदीकी गाँवों से आते थे वे अपने मास्टर जी के लिए बारी बारी से रोज दूध भी ले आते थे ! पैसे कम थे लेकिन इमानदारी थी, सज्जनता थी और एक दूसरे पर अटूट विश्वास था ! इस गाँव के बच्चे पूरे एक हफ्ते में गाँव आते थे, अपने मैले कपडे स्वयं धोते थे और फिर सोमवार की सुबह दुबारा एक हफ्ते का राशन पानी लेकर दश बजे स्कूल में हाजिरी देने के लिए चले जाते थे ! यह सिलसिला चलता रहता था जब तक बच्चे अपनी ८ वीं की परिक्षा नहीं दे देते थे ! गाँव में करीब सबकी आर्थिक स्थिति एक जैसे ही थी, हाँ उन्नीस बीस का अंतर जरूर था, जिनके बच्चे ज्यादा होते उनको ज्यादा मेहनत करनी पड़ती ! हल बैल सब के होते थे ! दो तीन गाएं कुछ बकरिया और कुछ भेड़ें भी वे पालते थे ! गाँव चारों और से जंगलों से घिरा हुआ था, इस तरह घास लकड़ी की ज्यादा परेशानी नहीं थी ! कस्बा भी गाँव से दूर ही पड़ता था, वहां कसबे में राशन पानी की दुकाने थीं ! एक डाक खाना था ! एक सरकारी छोटा सा नर्सिंग होम था, जहां एक नर्सिंग सहायक तथा एक सफाई कर्म चारी था ! लोग समय का सदपयोग करना जानते थे, चार बज उठकर हल बैल लेकर खेतों में चले जाना, घर की स्त्रियाँ चार बजे ही कूटना पिसने का काम शुरू कर देती थी ! वे फिर गोशाला में जाकर मवेशियों को बाहर निकालती थी, गोबर समेट कर खेतों में डाल कर आती थी, फिर चश्मे से पानी लाती ! जिन घरों में सास ससुर होते थे वहां बच्चों की देखभाल और खाना बनाने की चिता नहीं रहती, लेकिन सभी भाग्यशाली भी तो नहीं होती थी ! बिजली नहीं थी, मिट्टी का तेल इस्तेमाल होता था, हर परिवार को महीने में केवल दो बोतले मिट्टी के तेल की मिलती थी ! उसी से लालटेन या चिमनियाँ जलती थी ! इसी रोशनी में बच्चे पढ़ते थे ! यही नहीं घर की औरतों को हल लगाने वाले के लिए रोटी और बैलों के लिए जौ के आटे का नास्ता लेकर जाना पड़ता था जहाँ हल लगता ! हल के पीछे पीछे भारी डले निकलते उन्हें फोड़ना पड़ता था, फिर घास लकड़ी के लिए जंगल जाना पड़ता, इस तरह पूरा दिन निकल जाता और कहीं जाकर रात के दश बजे खाना खाकर कमर सीधी करने को अवसर मिलता ! ! मर्द हल लगाकर फिर घर के दूसरे कामोंमें लग लगजाते थे , जैसे हल, जुआ, रस्सी बटना, चारपाई की दावन मवेशियों को बांधने के लिए मजबूत रस्सियाँ, बांस की टोकरी, बहुत सारे काम उन्हें करने पड़ते थे ! ईश्वर की उन पर बड़ी मेहर थी की वे बीमार नहीं होते थे ! कभी कभार सर्दी जुकाम, सर दर्द पीड़ा आम बात थी, उसके लिए कुल पुरोहित होते थे ! इन ब्राह्मणों के पास जमीन नहीं होती थी, लेकिन वे संस्कृति और हिन्दी की अच्छी जानकारी रखते थे ! उनकी हर गाँव में अपनी अपनी वृति होती थी, वे शादी विवाह कराते थे, अपने जजमानों के यहाँ मौके बेमौके पूजा करने आते थे ! वही जन्म पत्री बनाते थे, वर वधु का चुनाव वही करते थे और छोटी मोटी दवा भी देते थे ! कुछ पंडित जी तो ज्योतिष के भी अच्छे जानकार थे ! जजमान भी अपनी हैसियत के मुताबिक़ उन्हें दान दक्षिणा देते थे ! कोई लोभी नहीं होता था, सभी गाँव वासी प्रेम से रहते थे, सामाजिक हर काम में सब इकट्ठा होकर एक दूसरे की मदद करते थे !
इस कहानी का मुख्या चरित्र पर्वतसिंह इसी गाँव का रहने वाला था ! इसने भी बचपन में अपने माँ बाप की सारी परेशानियां देखी थी ! इसने भी कठीन रास्तों पर गुजरते हुए ८ वीं की परिक्षा पास की थी ! आगे पढ़ने की गुंजायस भी नहीं थी और उसने भी जोर नहीं डाला अपने माँ बाप के ऊपर आगे पढ़ने के लिए ! दो साल उसने अपने पिता जी के साथ खेती पाती में उनका हाथ बंटाया ! अब वह १८ साल का हो गया था और नौकरी करके अपने पिता जी की आर्थिक मदद करना चाहता था ! वह सेना में भर्ती हो गया ! एक साल की ट्रेनिंग पूरी करने पर उसे जम्मू काश्मीर भेजा गया और उन्हीं दिनों सन १९६५ की लड़ाई छीड़ गयी पाकिस्तान के साथ ! इसकी यूनिट ने इस लड़ाई में बड़ी बहादुरी का काम किया ! जल्दी ही यूनिट को पीस स्टेशन जोशी मठ मिल गया ! इन्ही दिनों उसका विवाह हुआ परमेश्वरी देवी से ! जिस दिन से परमेश्वरी देवी इस घर में बहु बनकर आई उसी दिन से इस घर से दरिद्री धीरे धीरे बाहर जाने लगी और लक्ष्मी और गणेश जी की कृपा दृष्टि होने लगी ! परमेश्वरी देवी एक धर्म परायण नेक सत्यवादी और एक अच्छे संस्कार वाली नारी थी ! पर्वत सिंह भी हवलदार बन गया था ! उनका एक बच्चा भी होगया था नाम रखा सुमेरसिंह ! गाँव के पास तक सड़क आगई थी ! उसके पिता जी ने सड़क के किनारे ही एक छोटी सी परचून की दुकान खोल दी थी ! पर्वतसिंह भी घर पैसा भेजता था और कुछ दुकान से भी आमदनी होने लगी, इस तरह घर में परमेश्वरी देवी ने घर का माहोल ही खुशनुमा बना दिया ! सास ससुर बूढ़े हो गए थे उनकी दवा और खान पान पर विशेष ध्यान रखती थी ! सास के गठिया बाय थी, देर रात तक सास की मालिस किया करती थी ! सास ससुर खुश थे !
बाकी दूसरे भाग में जारी
गुरुवार, 26 मई 2011
क्रिकेट - ऐ पी एल - ४ (२०११)
२५ मई को पहला सेमी फाईनल मैच खेला गया ! ऐ पी एल के रुल के मुताबिक़ प्रथम और दूसरे स्थान वाले आपस में पहला सेमी फाईनल खेलेंगे और हारने वाली टीम को तीसरी - चौथी मैच जीतनी वाली टीम से मैच खेलना पडेगा जीतने वाली टीम ही फाईनल में प्रथम जीतने वाली टीम से भीडेगा ! २४ मई को फिर चेन्नई और आर सी बंगलौर का मैच हुआ ! पहले मैदान में बंगलौर उतरा बैटिंग करने के लिए ! इस मैच में गेल तो जम नहीं पाए पर अग्रवाल ने ३४, विराट कोहली ने ७०रन बनाए ! बंगलौर १७५/४ रन बना गयी और चेन्नई को १७६ रन बनाने थे ! चेन्नई ने १९.४ ओवरों में केवल चार विकेट खोकर १७७ रन बनाकर यह मैच ६ विकेटों से जीत लिया ! सुरेश रैना ने ७३ रन (नौट आउट) केवल ५० बोलें चार चौके , ६ छक्के बनाए, बद्रीनाथ ने ३४, धोनी ने २९ और मोर्कल ने २९ (नौट आउट) एक चौका और ३ छक्के केवल १० बौलों में बनाए और बड़े नाटकीय ढंग से मैच पर कब्ज़ा कर लिया ! दूसरे मैच में मुम्बई ने कोलकत्ता को हराकर नाईट राइडर कोलकाता को नौक आउट कर दिया ! पहले बैटिंग करते हुए कोलकत्ता ने मात्र १४७ रन बनाए जो मुम्बई ने १४८ रन बनाकर कोलकता को ४ विकेट से हराकर अपने लिए सेमी फाईनल का दरवाजा खोल दिया ! अब २७ तारीख को रोयल चैलेंजर्स बंगलौर का और मुम्बई इंडिया का मैच होगा जो जीतेगा फाईनल में जाएगा !