मंगलवार, 31 मई 2011

दादी माँ - दूसरा भाग

समय का पंच्छी अपने श्याम और श्वेत पंखों से खुले नील गगन में उड़ता गया और पर्वतसिंह के सैनिक जिन्दगी के २१ साल कब पूरे हो गए उसे पता भी नहीं चला ! उस समय वह कंपनी का हवलदार मेजर था और आगे के प्रोमोशन का कोई चांस नहीं था ! कंपनी ने उसके २१ साल की बेहतरीन, बहादुरी और एक आदर्श सैनिक की सेवा के लिए उसे एक मोमेंटो प्रदान किया जो उसे हर समय अपनी सेना में बिताए हुए अच्छे और संकटमय दिनों की याद दिलाता रहेगा और उसे भारतीय पूर्व सैनिक होने का गर्व होता रहेगा ! साथियों ने भी उसे यादगार भेंटों से लाद दिया था ! साथियों से बिछुड़ने का जहाँ गम था वहीं अपने माँ-पिता की सेवा करने का उसे अब अवसर मिल गया था इसकी उसे खुशी थी ! अपने परिवार में समय बिताने का और अपने एक मात्र लड़का सुमेर की देख रेख और उसकी पढाई लिखाई कराने का अब उसके पास वक्त ही वक्त था ! उस समय तक सुमेर ८ वीं की परीक्षा पास कर चूका था ! बारवीं तक की स्कूल उसके गाँव से ५ मील दूर थी , लेकिन अब सडकों ने गावं गाँव स्कूल और सरकारी अस्पतालों की दूरियां कम कर दी थी ! इस समय गाँव के १० बच्चे ९ वीं से १२ वीं में पढ़ते थे, सारे बच्चे एक साथ जाते थे जीप से और शाम को जीप से ही वापिस आते थे ! समय काफी बदल गया था, अब किसान खेतोंमें कम ही काम करते थे ! जवान बच्चे १० वीं और १२ वीं करके या तो सेना, नेवी, बी एस एफ, सी आर पी एफ या फिर स्टेट पुलिस में भरती होकर देश सेवा में लगे थे ! गाँव में अब बुजुर्गों की संख्या बढ़ने लगी, खेत खलियान बंजर होने लगे ! अब तो रोज नेताओं का जमघट गाँव गावों में होने लगा ! हर साल चुनावों का बिगुल बजने लगा ! बेकार और अनपढ़ लडके नेताओं का झोला उठाने में लग गए ! पर्वतीय क्षेत्रों के गाँव अब वीरान होने लगे ! जंगली जानवरों की आवाजाही होने लगी ! पहले खेत खलियानों में बन्दर लंगूरों को खाने को मिल जाता था,
लेकिन खेत खलियानों वीरान होने से वे घरों में घुसने लगे ! पहले गाँव फलदार पेड़ों से ढका था, आम, जामुन, संतरे, नीम्बू, चबूतरे, पपीते, सेब, अमरूद और नाशपाती ! समय की आंधी ऐसी चली की फसलों के साथ साथ सारे फलदार वृक्ष को भी उड़ाकर ले गयी ! ऊपर से बाघ का आतंक ! रोज कोई न कोई खबर आती की बाघ नर भक्षी
बन गया है, अमुक गाँव से आदमी को मार गया, अगले गाँव से एक बच्चे को उठाकर ले गया, आदि आदि ! अब माहोल काफी चिंता जनक होगया था ! कुछ परिवार तो बच्चों की सुरक्षा के लिए गाँव छोड़ कर शहरों या कस्बों में जाने लगे ! लेकिन पर्वतसिंह वहीं डटा रहा ! सुमेर ने भी १२ वीं सास कर ली थी और आगे इंजिनियर कोर्स के लिए बंगलौर चला गया था ! धीरे धीरे पर्वत सिंह के माता - पिता जी बीमार रहने लगे और ऊपर वाले की लीला तो देखो दोनों एक हफ्ते के अंतर से एक के बाद दूसरा स्वर्ग वासी हो गए ! अब घर में रह गए पर्वतसिंह और उसकी पत्नी परमेश्वरी ! उधर सुमेरसिंह ने चार साल का कोर्स पूरा किया और अपने साथ पढ़ने वाली एक सेठ की बेटी से शादी कर दी ! वहीं उसकी नौकरी भी लग गयी ! यह सुनकर पर्वतसिंह और उसकी पत्नी को बड़ा सदमा लगा ! और इसी सदमे से आहत होकर वह भी इस पञ्च तत्व के शरीर को छोड़ कर दूसरे लोक को चला गया ! परमेश्वरी पर तो मानों बज्रपात ही होगया ! दो दिन तक तो उसे होश ही नहीं रहा ! गाँव में एकता थी, सारे गाँव वाले इकट्ठे हो गए, कोइ वैद्य को बुलाने गया कोइ दवाई लेने कस्बा गया आखीर उनकी मेहनत रंग लाई और परमेश्वरी देवी होश में आई ! कुछ दिनों तक तो रोना धोना होता रहा, गाँव की बुजुर्ग महिलाएं हर वक्त परमेश्वरी के साथ साथ रहने लगी उसे ढाढस देती रही और जिन्दगी जीने की हिम्मत देती रही ! लडके को खबर दे दी गयी थी लेकिन वह नहीं आया ! समय गुजरता रहा परमेश्वरी रोज अपने लडके का इंतज़ार करती रहती, हर आने वाली बस के आगे खडी हो जाती, लेकिन सुमेर नहीं आया ! इस तरह तीन साल बीत गये ! और एक दिन अचानक सुमेर आया अकेला नहीं अपनी पत्नी सुधा और एक साल के बचे के साथ ! बच्चे के साथ परमेश्वरी अपने को भूल गयी ! सारे गिल्वे शिकवे भूल गयी ! बच्चा भी हर समय दादी के इर्द गिर्द ही घूमता रहता था ! बच्चे का नाम था अमन बहुत सुन्दर और प्यारा था ! दो महीने कब बीत गए पता ही नहीं चला ! इन्हीं दिनों सुमेर ने गाँव की जमीन और मकान दूसरे गाँव के जमीदार को बेच दिया ! परमेश्वरी को खबर भी नहीं होने दी ! फिर आकर अपनी माँ को कहा की "माँ मैंने यह गाँव की पैतृक जमीन बेच दी है, क्या दिया है इसने हमें उलटा दादी दादा और मेरे पिता जी को मेरे से छीन लिया, फिर इसकी देख भाल तू अकेले कर भी नहीं सकती थी, अब तू बंगलौर हमारे साथ ही रहेगी ! देख पोता तेरे साथ किस कदर हिल मिल गया है, अब तुम्हे अपने पोते के साथ ही रहना है !" पहले परमेश्वरी ना नुकुर करती रही लेकिन आखीर जाने के लिए तैयार हो गयी ! गाँव के बुजुर्गों ने जाते जाते उसे सावधान होने को कहा था, सारे गाँव वासी बड़े छोटे उसे भेजने के लिए बस स्टॉप तक आये थे, महिलाएं गले मिल कर खूब रोई थी, बहुत सालों का बंधन जो था ! वे लोग बंगलौर पहुँच गए ! माँ को सुमेर ने कुछ भी नहीं बताया जमीन के बारे में की "उसने जमीन किसको बेची और कितने में बेची " ! सारे पैसे अपने पास ही रख लिए ! बंगलौर आकर दो महीने तक तो माँ का आदर सत्कार होता रहा लेकिन तीसरे महीने में जैसे गर्मी आने लगी सुमेर ने तीन कमरों के मकान होते हुए भी माँ की चारपाई स्टोर रोम में लगा दी ! वहां बेचारी गर्मी से मच्छरों से परेशान होने लगी, लेकिन किसी से कुछ भी नहीं कह पाती थी ! कभी पेट में पीड़ा उठ जाती, कभी बुखार आजाता लेकिन चुपचाप वह सब कुछ सहन करती रहती ! उसे गाँव की याद आती, खुला हुआ घर, न गर्मी न सर्दी, जब कभी सिर में हल्का सा भी दर्द होता गाँव की बहुवें आकर सिर दबाती, पाँव दबाती, कितनी सेवा करती थी वे बहुवें जो अपनी सगी नहीं थी, पर प्रेम की डोर से बंधी थी ! और यहाँ तो सब अपने हैं ! समय निकलता रहा तीन साल बीत गए, पोता अमन अब पांच का हो गया था ! पोता छोटा था लेकिन दादी की परेशानियां समझता था ! एक दिन वह स्कूल से भागता हुआ आया सीधे दादी
के पास स्टोर रोम में गया और जोर जोर से बोला "दादी अब तुम्हे यह घर छोड़ना पड़ेगा, आपके लिए इस घर में कोइ स्थान नहीं हैं ! कल से स्टोर में हमारी नौकरानी रहेगी, ये कम्बल का आधा टुकड़ा ले जाओ और यहाँ से जाओ कहीं भी जाओ पर हमारे घर से जाओ ! परमेश्वरी इस अप्रत्यासित नादिर शाही आदेश से आहत हो गयी ! उसके मुंह के शब्द मुंह में ही रहगये ! वह चुप चाप खडी भौचक्की सी अपने पोते के रौद्र रूप को देख रही थी ! तब तक शोर शराबा सुन कर सुमेर के मम्मी पापा भी वहां आ गए ! उनको देख कर सुमेर और जोर से बोला, "सुनो दादी तुम्हारा सबसे बड़ा अफराध है की आप मेरे इंजिनियर पापा की मम्मी हो और इंजिनियर मम्मी की सास हो ! जब बड़े बड़े लोग आते हैं तो मुझे शर्म आती है आपको दादी कहते हुए ! " उसके पापा ने कहा कहा "तुम ठीक कहते हो, मैं भी यही सोच रहा था ! लेकिन तुमने ये कम्बल दो भागों में क्यों किया, पूरा ही कम्बल दे देते दादी को " ! अमन बोला मम्मी पापा कुछ ही दिनों की तो बात है कल आपको भी बुढापा आ जाना है और मुझे आप लोगों को भी घर से निकालना पडेगा फिर एक और कम्बल फाड़ना पडेगा, ये बचा हुआ टुकड़ा आपके लिए रखा हुआ है ! यह सुनते ही सुमेर और उसकी पत्नी की सोई हुई इंसानियत जाग गयी ! अमन बोला, 'तुमने मेरी दादी को जानवरों से भी गया बीता समझ कर स्टोर रोम में डाल रखा है, मैं भी तो वही शिक्षा ले रहा हूँ आप लोगों से " ! इतना कहते हुए वह दादी से लिपट कर फूट फूर कर रो पड़ा ! उसके मम्मी पापा भी परमेश्वरी के कदमों में गिर पड़े ! गीड गीडाने लगे अपने अफराधों के लिए माँ से क्षमा माँगने लगे ! उस दिन से परमेश्वरी की खूब इज्जत और आदर होने लगा ! उसको एक सजा सजा कमरा दिया गया, वहां कूलर फिट किया गया ! अब दादी पोते एक ही कमरे में रहते हैं ! दादी भी खुश और पोता भी खुश हैं !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें